आजादी की कहानी, कितनी पुरानी (वृत्त - 1)
अधिकतर देशवासियों को 1857 के स्वतंत्रता संग़्र्राम तक की जानकारी तो है, जो मुगल सल्तनत के अंतिम बादशाह बहादुर शाह जफर के प्रतीकात्मक नेतृत्व में लड़ा गया, जिसमें झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, कानपुर के नाना साहेब और तात्या टोपे, लखनऊ की बेगम हजरत महल, बिहार के कुंवर सिंह, बैरकपुर के मंगल पांडे, बरेली के खान बहादुर खान और फैजाबाद के मौलवी अहमदुल्लाहखान के साथ ही पूरे देश के क्रांतिकारियों ने अपने प्राणों की बाजी लगा दी और अमर शहीद हो गये। परंतु उससे पहले लड़ी गई स्वतंत्रता की लड़ाइयों से देश अनजान है। आज जनमानस को उसकी याद दिलाने की आवश्यकता है, ताकि नाखून कटवाकर देश को आजादी दिलवाने का दावा करने वालों और भ्रम फैलाने वालों के षड्यंत्र को सफल होने से रोका जा सके, देश आजादी के वास्तविक सेनानियों के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित कर उन्हें वांछित सम्मान दे सके। वास्तव में आजादी की लड़ाई वर्ष 1757 में ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत प्रवेश के बाद से ही, देश को आजादी दिलाने का दावा करने वाली कांग्रेस की अंग्रेज एच ओ ह्यूम द्वारा स्थापना किये जाने से मात्र 128 वर्ष पूर्व शुरू हो चुकी थी। वर्ष...